पार्टी से हो गए बाहर, कैसे होगी अब नेताजी की नैया पार

Dhun Pahad Ki

एक जमाने में जिन नेताओं की बोलती थी तूती, अब कांटों भरी राह
देहरादून। जरा यूपी के जमाने को याद कीजिए, जब उत्तराखंड पर खास केंद्रित करते हुए एक विभाग होता था उत्तराखंड विकास विभाग। नब्बे के दशक में जब कल्याण सरकार बनी, तो उत्तराखंड के जिस विधायक को इस विभाग का स्वतंत्र प्रभार देते हुए राज्यमंत्री बनाया गया, उनका नाम मातबर सिंह कंडारी था। इसी तरह, उत्तराखंड राज्य बनने के बाद कांग्र्रेस की सरकार में सिंचाई जैसे अहम मंत्रालय को शूरवीर सिंह सजवाण ने संभाला। जिन नेताओं की कभी सियासत में तूती बोला करती थी, 2022 के विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी से बेआबरू होकर अब वह निर्दलीय बतौर संघर्ष की राह पर चल रहे हैं।
बात सिर्फ कांग्रेस के घर से बाहर हुए मातबर सिंह कंडारी और शूरवीर सिंह सजवाण तक सीमित नहीं है। भाजपा में राजकुमार ठुकराल, महावीर रांगड जैसे पूर्व विधायकों की भी मिलती-जुलती कहानी है। ये सभी नेता निर्दलीय बतौर चुनाव मैदान में दम ठोंक रहे हैं। यह अलग बात है कि कांग्रेस और भाजपा के संगठनात्मक ढांचे से अलग होकर निर्दलीय बतौर यह कितनी दूर तक जा पाएंगे। मातबर सिंह कंडारी यूपी के अलावा उत्तराखंड में भी कई बार मंत्री रहे हैं। उनके राजनीति में बुरे दिनों की शुरूआत वर्ष 2012 में हुई, जबकि रूद्रप्रयाग सीट पर हरक सिंह रावत ने उन्हें हरा दिया था। इसके बाद, वह राजनीति में संभल नहीं पाए हैं, जबकि उन्होंने भाजपा से कांग्रेस तक का सफर भी पूरा किया है। एक बार फिर, वह रूद्रप्रयाग सीट से चुनाव मैदान में हैं और निर्दलीय बतौर ही किस्मत आजमा रहे हैं।
पूर्व कैबिनेट मंत्री शूरवीर सिंह सजवाण देवप्रयाग से वर्ष 2017 का चुनाव भी लडे़ थे, लेकिन सफल नहीं हो पाए थे। कांग्रेस से टिकट न मिलने पर उन्होंने निर्दलीय बतौर ही ताल ठोंकी थी। इस बार भी उन्हें टिकट नहीं मिला, तो वह ऋषिकेश सीट से चुनाव मैदान में उतर आए हैं। इसी तरह, दो बार रूद्रपुर से विधायक रहे राजकुमार ठुकराल की कहानी है। इस बार उनका भाजपा ने टिकट काट दिया है। राजकुमार ठुकराल ने दस साल पहले कांग्रेस का दुर्ग माने जाने वाले रूद्रपुर सीट को फतह किया था। इस सीट पर एक समय में तिलकराज बेहड को अपराजित माना जाता था, लेकिन ठुकराल ने ही यहां पर भाजपा का परचम लहराया था। मगर अब वह भाजपा से बाहर हैं और निर्दलीय बतौर चुनाव लड़ रहे हैं। धनोल्टी से विधायक रहे महावीर रांगड भी पार्टी से बाहर निकलकर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। उन्हें निवर्तमान सरकार के दौरान गढ़वाल मंडल विकास निगम का चैयरमैन बनाया गया था। भाजपा-कांग्रेस के जिन नेताओं की एक जमाने में तूती बोला करती थी, अब निश्चित तौर पर उनके सामने यह सवाल है कि वह दलों से बाहर आकर चुनाव में किस तरह से जीत हासिल कर पाएंगे।
हिन्दुस्थान समाचार/विपिन बनियाल

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