उत्तराखंड विधानसभा चुनावः आ गया निर्णायक क्षण

Dhun Pahad Ki

 

भाजपा-कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला, आप की भूमिका पर नजर
-उत्तराखंड विधानसभा की 70 सीटों पर चुनाव के लिए निर्णायक क्षण आ गया है। 14 फरवरी को मतदाता वोटिंग मशीन पर बटन दबाकर यह तय कर देगा कि राज्य की सत्ता में कौन सिरमौर होगा। पूरे चुनाव पर एक नजर डालकर देखने पर सत्तासीन भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला नजर आ रहा है। पहली बार उत्तराखंड विधानसभा के चुनाव में हाथ आजमा रही आम आदमी पार्टी यानी आप की भूमिका पर सबकी नजर होगी।
अपनी-अपनी ताकत और कमजोरी के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सत्तासीन होने का दावा कर रहे हैं। उत्तराखंड जैसे अपेक्षाकृत छोटे राज्य के चुनाव में जिस तरह से दोनों ही दलों की दिग्गज नेताओं ने खुद को झोंका, वह यह बताने के लिए काफी है कि प्रदेश के चुनाव की दलों के लिए कितनी ज्यादा अहमियत है। स्टार प्रचारकों को जमीन पर उतारकर फिजां बनाने के मामले में निश्चित तौर पर भाजपा इक्कीस साबित हुई है। चुनावी कार्यक्रम के लिए कोविड-19 के प्रोटोकॉल में छूट मिलने के बाद भाजपा ने अपने स्टार प्रचारकों की पूरी फौज ही उत्तराखंड में उतार दी। तीन दिन खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मोर्चे पर डटे और रैलियों से भाजपा के प्रचार अभियान को हवा दी। अमित शाह, राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथ, जेपी नड्डा समेत तमाम स्टार प्रचारकों ने भी खूब पसीना बहाया। दूसरी तरफ, कांग्रेस से स्टार प्रचारक प्रियंका गांधी और राहुल गांधी ने ही मोर्चा संभाला। पहली बार चुनाव मैदान में उतरी आप के लिए अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया ने प्रचार में जान झोंकी, लेकिन भाजपा के मुकाबले उनका प्रचार अभियान उतना तेज नहीं रह पाया। बसपा के लिए मायावती ने एकाध जगह पर रैली करके काम चलाया।
इस चुनाव पर भाजपा एक बार फिर मोदी मैजिक के सहारे हैं। पार्टी का नारा खुद ब खुद सारी स्थिति बयान कर रहा है। नारा है-अबकी बार, मोदी-धामी सरकार। मोेदी का प्रभाव भाजपा का मनोबल बढ़ा रहा है, हालांकि तीन-तीन सीएम बदलने की बात उसे असहज भी कर रही है। भाजपा का मजबूत पार्टी संगठन एक बार फिर उसके लिए मजबूत रक्षा कवच बनता दिख रहा है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, उसके लचर पार्टी संगठन उसे दिक्कत दे रहा है, हालांकि तमाम जगहों पर उसके प्रत्याशी इतने मजबूत हैं, कि उनकी खुद की टीम ही भाजपा के लिए चुनौती साबित हो रही है। पार्टी को एंटी इनकमबेंसी का सहारा है, हालांकि ऊपरी तौर पर सत्ता विरोधी रूझान कहीं नहीं दिख रहा है, अंडर करंट क्या है, ये कोई कहने की स्थिति में नहीं है। आप ने जोर शोर से चुनाव मेें कदम तो रखा है, लेकिन करिश्माई नेताओं और मजबूत पार्टी संगठन का अभाव उसे कदम-कदम पर भारी पड़ रहा है। इन स्थितियों के बीच कुछ जगहों पर वह हार जीत के समीकरणों को प्रभावित करने की स्थिति में है। आप की कोशिश अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराने की है, उत्तराखंड के वोटर उसे कितना आत्मसात करते हैं, ये देखने वाली बात होगी।
राज्य बनने के बाद बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस सत्ता की अदल बदल करती रही है। इस बार क्या ये मिथक कायम रहेगा या टूटेगा, इस पर लोेग जानना चाहते हैं। भाजपा यदि सत्तासीन होती है, तो जीत का सेहरा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सिर पर बंधना तय है। कांग्रेस जीतती है, तो दिग्गज नेता हरीश रावत को ही सबसे ज्यादा नंबर मिलेंगे। पार्टी की जीत एक बड़ा लक्ष्य है। धामी और हरीश रावत को अपनी-अपनी विधानसभा सीटों पर जीत का परचम लहराना है, जहां पर उनके बडे़ कद के अनुरूप पार्टियों ने अपने उम्मीदवार खडे़ नहीं किए हैं।

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