सैन्य वार्ता का बेनतीजा होना चीन की नाकामियों का परिणाम, जैसे को तैसा की बने रणनीति

Dhun Pahad Ki

चीन के वादे हों या इरादे दोनों पर कभी भी भरोसा नहीं किया जा सकता। दरअसल चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अमन-चैन की बहाली का इरादा रखता ही नहीं है। कोरोना काल में जब दुनिया स्वास्थ्य की समस्या से जूझ रही थी तब वह पिछले साल अप्रैल-मई में अपनी कुटिल चाल पूर्वी लद्दाख की ओर चल चुका था जो अभी भी नासूर बना हुआ है। हालिया घटना से पहले जून 2017 में डोकलाम विवाद 75 दिनों तक चला जिसे लेकर जापान, अमेरिका, इजराइल व फ्रांस समेत तमाम देश भारत के पक्ष में खड़े थे और अंतत: चीन को पीछे हटना पड़ा था। हालांकि डोकलाम विवाद को पूरी तरह समाप्त अभी भी नहीं समझा जा सकता।

इतिहास के पन्नों में इस बात के कई सबूत मिल जाएंगे कि भारत और चीन के बीच संबंध भी पुराना है और रार भी पुरानी है। वर्ष 1962 के युद्ध के बाद 1975 में भारतीय सेना के गश्ती दल पर अरुणाचल प्रदेश में चीनी सेना ने हमला किया था। भारत और चीन संबंधों के इतिहास में 2020 का जिक्र भी अब 1962 और 1975 की तरह ही होता दिखता है। इसकी वजह साफ है भारत-चीन सीमा विवाद में 45 साल बाद भी सैनिकों की जान का जाना। दोनों देशों के बीच सीमा का तनाव नई बात नहीं है, व्यापार और निवेश चलता रहता है, राजनीतिक रिश्ते भी निभाए जाते रहे हैं, मगर सीमा विवाद हमेशा नासूर बना रहता है।

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